सहयोगी राज्य

मध्य प्रदेश का इतिहास "अतुल्य भारत का हृदय"

किसी देश या राज्य की भौगोलिक स्थिति, उस स्थान की ऐतिहासिक घटनाओं और आर्थिक विकास को बहुत अधिक प्रभावित करती है। यह अपने नागरिकों और उनके व्यवहार के दृष्टिकोण को भी प्रभावित करती है। भौगोलिक रूप से देश के केंद्रीय स्थान पर स्थित मध्य प्रदेश, वास्तव में भारत के हृदय के समान है।

अपने केंद्रीय स्थान के कारण इस क्षेत्र पर सभी ऐतिहासिक धाराएं, स्वाभाविक रूप से अपने सुस्पष्ट निशान छोड़ गईं। प्रागैतिहासिक काल पत्थर युग से शुरू होता है, जिसके गवाह भीमबेटका, आदमगढ, जावरा, रायसेन, पंचमढ़ी जैसे स्थान हैं। हालांकि राजवंशीय इतिहास, महान बौद्ध सम्राट अशोक के समय के साथ शुरू होता है, जिसका मौर्य साम्राज्य मालवा और अवंती में शक्तिशाली था। कहा जाता है कि सम्राट अशोक की पत्नी विदिशा से थीं, जो आज के भोपाल के उत्तर में स्थित एक शहर है। सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य का पतन हुआ और ई. पू. तीन से पहली सदी के दौरान मध्य भारत की सत्ता के लिए शुंग, कुषाण, सातवाहन और स्थानीय राजवंशों के बीच संघर्ष हुआ। ई. पू. पहली शताब्दी में उज्जैन प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र था। गुप्त साम्राज्य के दौरान चौथी से छठी शताब्दी में यह क्षेत्र उत्तरी भारत का हिस्सा बन गया, जो श्रेष्ठ युग के रूप में जाना जाता है। हूणों के हमले के बाद गुप्त साम्राज्य का पतन हुआ और उसका छोटे राज्यों में विघटन हो गया। हालांकि, मालवा के राजा यशोधर्मन ने ई. सन 528 में हूणों को पराभूत करते हुए उनका विस्तार समाप्त कर दिया। बाद में थानेश्वर के हर्ष ने अपनी मृत्यु से पहले ई.सन 647 तक उत्तरी भारत को फिर से एक कर दिया। मध्ययुगीन राजपूत काल में 950 से 1060 ई.सन के दौरान मालवा के परमार राजाओं और बुंदेलखंड के चंदेल जैसे कुलों का इस क्षेत्र पर प्रभुत्व रहा। भोपाल शहर को नाम देनेवाले परमार राजा भोज ने इंदौर और धार पर राज किया। गोंडवाना और महाकौशल में गोंड राजसत्ता का उदय हुआ। 13 वीं सदी में, दिल्ली सल्तनत ने उत्तरी मध्य प्रदेश को हासिल किया था, जो 14 वीं सदी में ग्वालियर की तोमर और मालवा की मुस्लिम सल्तनत (राजधानी मांडू) जैसे क्षेत्रीय राज्यों के उभरने के बाद ढह गई।

1156-1605 अवधि के दौरान, वर्तमान मध्य प्रदेश का संपूर्ण क्षेत्र मुगल साम्राज्य के तहत आया, जबकि गोंडवाना और महाकौशल, मुगल वर्चस्व वाले गोंड नियंत्रण के तहत बने रहे, लेकिन वहाँ आभासी स्वायत्तता रही। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल नियंत्रण कमजोर हो गया, जिसके परिणाम स्वरूप मराठों ने विस्तार करना शुरू किया और 1720-1760 के बीच उन्होंने मध्य प्रदेश के सबसे बड़े हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इंदौर में बसे अधिकतर मालवा पर होल्कर ने शासन किया, ग्वालियर पर सिंधिया ने तथा नागपुर द्वारा नियंत्रित महाकौशल, गोंडवाना और महाराष्ट्र में विदर्भ पर भोंसले ने शासन किया। इसी समय मुस्लिम राजवंश के अफगान के जनरल दोस्त मोहम्मद खान के वंशज भोपाल के शासक थे। कुछ ही समय में अंग्रेजों ने बंगाल, बंबई और मद्रास जैसे अपने गढ़ों से अधिराज्य का विस्तार किया। उन्होंने 1775-1818 में मराठों को पराजित किया और उनके राज्यों के साथ संधि कर उन पर प्रभुत्व स्थापित किया। मध्य प्रदेश के इंदौर, भोपाल, नागपुर, रीवा जैसे बड़े राज्यों सहित अधिकांश छोटे राज्य ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आ गए। 1853 में अंग्रेजों ने नागपुर के राज्य पर कब्जा कर लिया, जिसमे दक्षिण-पूर्वी मध्य प्रदेश, पूर्वी महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ शामिल थे, जो 1861 में मध्य प्रांत के निर्माण हेतु सौगोर और नेरबुड्डा आतंकियों के साथ जुड़े हुए थे। उत्तरी मध्य प्रदेश के राजसी राज्य सेंट्रल इंडिया एजेंसी द्वारा संचालित किए जाते थे।

1947 में भारत की आजादी के बाद, 26 जनवरी, 1950 के दिन भारतीय गणराज्य के गठन के साथ सैकड़ों रियासतों का संघ में विलय किया गया था। राज्यों के पुनर्गठन के साथ सीमाओं को तर्कसंगत बनाया गया। 1950 में पूर्व ब्रिटिश केंद्रीय प्रांत और बरार, मकाराई के राजसी राज्य और छत्तीसगढ़ को मिलाकर मध्य प्रदेश का निर्माण हुआ तथा नागपुर को राजधानी बनाया गया। सेंट्रल इंडिया एजेंसी द्वारा मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल जैसे नए राज्यों का गठन किया गया। राज्यों के पुनर्गठन के परिणाम स्वरूप 1956 में, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल राज्यों को मध्य प्रदेश में विलीन कर दिया गया, तत्कालीन सी.पी. और बरार के कुछ जिलों को महाराष्ट्र में स्थानांतरित कर दिया गया तथा राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश में मामूली समायोजन किए गए, फिर भोपाल राज्य की नई राजधानी बन गया। शुरू में राज्य के 43 जिले थे। इसके बाद, वर्ष 1972 में दो बड़े जिलों का बंटवारा किया गया, सीहोर से भोपाल और दुर्ग से राजनांदगांव अलग किया गया। तब जिलों की कुल संख्या 45 हो गई। वर्ष 1998 में, बड़े जिलों से 16 अधिक जिले बनाए गए और जिलों की संख्या 61 बन गई। नवंबर 2000 में, राज्य का दक्षिण-पूर्वी हिस्सा विभाजित कर छत्तीसगढ़ का नया राज्य बना। इस प्रकार, वर्तमान मध्य प्रदेश राज्य अस्तित्व में आया, जो देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है और जो 308 लाख हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र पर फैला हुआ है|

भारत के केंद्र में स्थित मध्य प्रदेश देश का हृदय स्थल कहलाता है। भू-वैज्ञानिक दृष्टि से यह भारत का प्राचीनतम भाग है। हिमालय से भी पुराना यह भूखंड किसी समय उस संरचना का हिस्सा था जिसे गोंडवाना महाद्वीप कहा गया है। भारतीय इतिहास का मध्य प्रदेश से बहुत पुराना संबंध है। भारतीय इतिहास में से मध्य प्रदेश के इतिहास को निम्नानुसार बांटा जा सकता है।

  • प्रागैतिहासिक मध्य प्रदेश
  • पाषाण एवं ताम्रकाल
  • प्राचीन काल
  • महाकाव्य काल
  • महा जनपद काल
  • शुंग और कुषाण
  • मुगल काल
  • भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
  • मध्यकाल

मध्य प्रदेश पर्यटन

भारत के हृदयस्थल के रूप में स्थापित मध्य प्रदेश अपने विस्तृत क्षेत्र में पर्यटन की असीम संभावनाओं को समेटे हुए है। सतपुड़ा एवं विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं से आच्छादित इस प्रदेश में विभिन्न प्रकार के पर्यटकों के लिये सांस्कृतिक विरासत, नैसर्गिक सौंदर्य, कलात्मक मंदिर, स्तूप, वैभवशाली किले एवं राज प्रसाद आदि पुरातत्वीय महत्व के स्मारक उपलब्ध है।

वर्तमान में अनेक पर्यटन केंद्र प्रदेश में पर्यटकों को लुभा रहे हैं। इन केंद्रों में से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त केंद्र हैं जिन्हे निम्नानुसार वर्गीकृत किया जा सकता है।

  • ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व के स्थान खजुराहो, सांची, मांडू, ग्वालियर, औरछा एवं भीमबैठका।
  • प्राकृतिक सौंदर्य के स्थान- पचमढ़ी, भेड़ाघाट।
  • धार्मिक महत्व के स्थान- उज्जैन, अमरकंटक, औंकारेश्वर, महेश्वर, चित्रकूट, मैहर एवं बुरहानपुर।
  • राष्ट्रीय उद्यान- कान्हा, बांधवगढ़, शिवपुरी, पेंच एवं पन्ना।

देश एवं आर्थिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक विकास में पर्यटन के महत्व एवं योगदान को दृष्टिगत रखते हुये प्रदेश के पर्यटन केंद्रों के विकास, बुनियादी सुविधाओं को उपलब्ध कराये जाने, स्थलों के प्रचार-प्रसार आदि के दृष्टिकोण से प्रदेश में इस कार्य के लिये पृथक रूप से विभाग रखे जाने की आवश्यकता महसूस की गयी थी।

पर्यटन विभाग के मुख्य दायित्व- प्रदेश में पर्यटन स्थलों को चिह्नित किया जाना; पर्यटन स्थलों पर अधोसंरचना का विकास; आवास परिवहन सुविधा उपलब्ध कराया जाना; प्रदेश के पर्यटन स्थलों की जानकारी उपलब्ध कराये जाने के लिये प्रचार-प्रसार; पर्यटन साहित्य का प्रकाशन उत्सव-मेलों का आयोजन; युवा एवं साहसिक पर्यटन का विकास; बजट नियत्रंण केंद्र शासन से आर्थिक सहायता प्राप्त करना; मंत्री परिषद् के निर्णयों का क्रियान्वयन; अन्य विभागों से समन्वयन आदि। इन कार्यों के निष्पादन के लिये पर्यटन विभाग के अंतर्गत आयुक्त, पर्यटन कार्यालय एवं मध्य प्रदेश स्टेट टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड का गठन किया गया है।

मध्य प्रदेश स्टेट टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड प्रदेश के प्रमुख पर्यटन केंद्रों पर प्रचार-प्रसार के माध्यम से पर्यटकों को आकर्षित करने का प्रयास करता है। निगम प्रदेश के बाहर से आने वाले पर्यटकों को पैकेज टूर्स के माध्यम से प्रदेश के पर्यटन स्थलों का भ्रमण करवाता है। यह प्रदेश की लोक कला संस्कृति को लोकप्रिय बनाने की दृष्टि से प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों पर उत्सव-मेले का आयोजन भी करता है। इस प्रकार निगम प्रदेश में पर्यटकों को अधिक से अधिक संख्या में आकर्षित करने का प्रयास करता है।

प्रदेश में आने वाले पर्यटकों को निगम द्वारा आवास, खान-पान, परिवहन सुविधा एवं पर्यटन संबंधी जानकारी उपलब्ध कराई जाती है।

प्रदेश में मध्य प्रदेश स्टेट टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड के 06 क्षेत्रीय कार्यालय, 18 सूचना कार्यालय और प्रदेश के बाहर 14 सेटेलाईट कार्यालय कार्य कर रहे हैं। साथ ही पर्यटकों के लिये 70 आवासीय, 09 गैर आवासीय इकाई और भ्रमण के लिये 118 गाड़ियाँ उपलब्ध कराई जाती हैं।

कनेक्टिविटी

वायु सेवा- दिल्ली, इंदौर और मुंबई से भोपाल के लिये नियमित वायु सेवा है।

रेल सेवा- भोपाल दिल्ली-चेन्नई मेन लाईन पर है। इटारसी और झाँसी के रास्ते दिल्ली जाने वाली प्रमुख गाड़ियाँ भोपाल से होकर गुजरती है।


सड़क मार्ग- भोपाल से इंदौर, मांडू, उज्जैन, खजुराहो, पचमढ़ी, ग्वालियर, साँची, जबलपुर और शिवपुरी के बीच नियमित बस सेवाएं है।

गिन्नौरगढ़ किला
सतधारा
बिड़ला मंदिर भोपाल
भोजपुर
भोपाल स्थित भारत भवन
भीमबैटका
बोट क्लब
चिड़िखो
नरसिंहगढ़ का किला
सलकनपुर
सलकनपुर
सांची
उद्यगिरी की गुफाएँ
भोपाल का बड़ा तालाब
Go to Navigation